विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष : हम और हमारा स्वास्थ्य

 विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष  : हम और हमारा स्वास्थ्य 




हर साल की तरह इस साल भी हम 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मना रहे है | लोगो के स्वास्थ्य स्तर को सही एवं स्वस्थ रखने तथा जन समुदाय को निरंतर जागरूक रखने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा पिछले 71 वर्षो से लगातार 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जा रहा है | इसे मनाये जाने का मुख्य उद्देश्य दुनिया के हर व्यक्ति को स्वास्थ्य के लिए उचित व्यवस्स्था उपलब्ध कराना,उनका स्वास्थ बेहतर बनाना, उनके स्वास्थ्य के स्तर को ऊचा उठाना तथा जनजागरण कार्यक्रम चला कर लोगो को तमाम तरह की बिमारिओ से अवगत कराना और उनसे बचाना होता है |

पूरे विश्व को निरोग बनाने के उद्द्येश्य से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 7 अप्रैल 1948 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (w . h. o.) की स्थापना की गई तथा इसके स्थापना दिवस पर ही 7 अप्रैल 1950 को विश्व स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाये जाने का निर्णय लिया गया | तब से लेकर आज तक हर साल पूरा विश्व इस दिन को "विश्व स्वास्थ्य दिवस" के रूप में मनाता है ,पिछले एक वर्ष से दुनिया कोरोना वायरस से जूझ रही है ऐसे में इस दिवस की महत्ता और भी बढ़ जाती है पूरी दुनिया इस वायरस से निजात पाने में लगी हुई है और भारत सहित कई देशो में वैक्सीनेशन का काम तेजी से चल भी रहा है | हालांकि दुनिया के तमाम देश स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहे है लेकिन कोरोना जैसे वायरसों के सामने पिछले साल अमेरिका जैसे विकसित देश भी बेबस और लाचार नज़र आये वहा भी स्वास्थ्य कर्मचारिओं के लिए जरूरी सुविधाओं की कमी का टोटा साफ़ दिखाई दिया | यह सीन देखने के बाद दुनिया के अन्य देशो को अहसास हुआ कि अभी भी स्वास्थ्य सुविधाएं आम लोगो की पहुंच से बहुत दूर है और अभी भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है | विश्व स्वास्थ्य संगठन (w.h.o.) इस बात को मानता है कि अभी भी दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी को जरूरी स्वाथ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं है | दुनिया के तमाम देशो के करोङो लोगो को अपनी मूलभूत आवश्यकताओं तथा स्वास्थ्य सुविधाओं में से किसी एक को चुनना पड़ता है जो की उनकी मजबूरी है |





पूरे विश्व में लगभग 80 करोड़ से भी ज्यादा लोग अपने घर के बजट का कम से कम दस फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते है तथा दस करोड़ से भी ज्यादा लोग इन सेवाओं पर खर्च करने कारण गरीबी रेखा के नीचे चले जाते है | पिछले कुछ दशकों में एक ओर जहा स्वास्थ्य छेत्र ने काफी प्रगति की है,वही एड्स,कैंसर,हृदय रोग,मधुमेह,छय रोग,मोटापा तथा मानसिक तनाव जैसी समस्याए भी तेजी से बढ़ी है यदि भारत की बात की जाय तो वर्तमान में अगर कोरोना काल को छोड़ दिया जाय तो आर्थिक दृष्टि से ठीक ठाक विकास हुआ है लेकिन इस आर्थिक विकास के बावजूद देश में करोड़ो लोग बिमारिओ तथा कुपोषण का शिकार भी हुए है | राष्ट्रिय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण केअनुसार तीन वर्ष की आयु वाले तीन फीसदी से भी ज्यादा बच्चो का विकास अपनी आयु गति के हिसाब से नहीं हो पाया है | हमारे देश में दस में से सात बच्चे अनीमिया से पीड़ित है तथा महिलाओ की तीस फीसदी से ज्यादा आबादी कुपोषण का शिकार है|

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में प्रक्षिशित लोगो की बड़ी कमी है यहाँ डाक्टर एवं जनता का अनुपात बेहद कम है | देश में सवा अरब से भी अधिक आबादी के लिए महज 26 हज़ार अस्पताल है यानि 47 हज़ार लोगो के लिए सिर्फ एक सरकारी अस्पताल उपलब्ध है वही सरकारी अस्पतालों में करीब डेढ़ लाख डाक्टर है यानि ग्यारह हज़ार लोगो के लिए सिर्फ एक डाक्टर उपलब्ध है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार एक हज़ार लोगो के लिए एक डाक्टर होना चाहिए |

आज की दौड़ भाग भरी जिंदगी में अधिकांश लोग जाने अनजाने में ही अपने स्वास्थ्य के प्रति खिलवाड़ कर रहे है तथा अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही कर रहे है तथा बदले में अनेको बिमारिओ के शिकार हो रहे है, इस लिए जरूरी है कि हर व्यक्ति अपने काम के साथ - साथ अपने स्वाथ्य को भी प्राथमिकता दे ताकि जीवन का यह सफर पूरी तरह से दवाओं पर निर्भर न रहे तथा हर कोई अपना जीवन स्वस्थ रह कर जी सके |

अतः हमें ध्यान देना होगा कि कुदरत की दी हुई इस अमूल्य नियामत को हम संभाल कर रख्खे तथा अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए डेली कुछ समय अवश्य दे |


आप का - संजय शुक्ल

टिप्पणियाँ

  1. स्वास्थ विभाग में कितने loopholes हैं इसका आईना तो corona दिखा गया पिछले वर्ष ही, दुखद यह है कि आज पूरे एक वर्ष के बाद भी हम उसी पावदान पर खड़े हैं। कागजों पर मैडम साहिबा के बजट में medical को बढ़त मिलने का लाभ संभवता सिर्फ बीच वालों को ही मिलेगा, क्योंकि ज़मीनी स्तर पे तो आज भी सरकारी अस्पतालों के बिस्तरों में मरीज़ और कुत्ते एक साथ ही सोते हैं 🙏
    आशा है कुछ बेहतर देखने को मिले

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  2. पर लोग इस गंभीर समस्या पर बात नही करना चाहते हैं।

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  3. पर लोग इस गंभीर समस्या पर बात नही करना चाहते हैं। अर्चना शुक्ला

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